गरम करे बर आगी बनाये

गरम करे बर आगी बनाये

गरम करे बर आगी बनाये,
अउ जुड करे बर पानी,
बरसे बर बनाये बादर,
भार सहे बर भुइया आगर्,
करम करे बर दिन गढे तै,
सुरताये बर अंधियारी रात,
नर नारी देव गढ डारे,
अउ किसम-किसम के जात्,
कोनो बने हे अन्धरा तोर घर्,
कोनो खोड़वा कोनो कोन्दा,
राम बने हे तोर खेवईया,
नहकावे सब्र के डोंगा,
सुघघर जगत के सिरजईया!!

The poem is in the regional language of Chhattisgarh called Chhattisgarhi.

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Girja Shankar

Girja Shankar

मेरे बारे मे कुछ खास नहीं ..☺


  1. Anjali Deshlahare on October 9, 2021 at 10:42 pm

    Wow ❤️

  2. Samiksha G on October 9, 2021 at 11:03 pm

    सुघ्घर कविता

  3. Sandeep on October 10, 2022 at 3:25 pm

    Bahut Sundar..

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